Aam Election में सियासी दलों को फिर मिला Ayodhya मुद्दे का टॉनिक, मध्यस्थता पर फैसला संभव

त्वरित फैसला हालांकि दूर क कौड़ी
इस विवाद पर त्वरित फैसला न करने केकारण भले ही शीर्ष अदालत भी एक वर्ग केआलोचनाओं का शिकार हुई है। हालांकि मध्यस्थता कमेटी अब भी त्वरित फैसले की गारंटी नहीं है। कम से कम आम चुनाव तक फैसला आने की संभावना दूर दूर तक नहीं है। हां, बातचीत केजरिए इस विवाद को सुलझाने की यह पहली अदालती कोशिश है। इससे पहले इस विवाद केहल के लिए कई बार राजनीतिक कोशिश हुई है। दअसल कमेटी एक हफ्ते बाद अपना काम शुरू करेगी। उसके चार हफ्ते बाद अदालत को प्राथमिक रिपोर्ट और फिर चार हफ्ते बाद अंतिम रिपोर्ट सौंपेगी। अंतिम रिपोर्ट सौंपने तक आम चुनाव संपन्न हो चुकेहोंगे। फिर समिति में विवाद केनिपटारे पर आमसहमति बनने पर ही अदालत फैसला सुनाने पर विचार करेगा। इसकी उलट स्थिति में सारा मुद्दा फिर वहां पहुंच जाएगा जहां से चलना शुरू किया था।
96 के बाद नहीं बना बड़ा मुद्दा
उत्तर भारत में एक समय राम मंदिर मुद्दा सभी मुद्दों पर हावी था। वर्ष 1992 से पहले 1990 में लालकृष्ण आडवाणी की रथयात्रा के बाद 1991 के चुनाव में यह प्रमुख मुद्दा बना। फिर वर्ष 1992 में विवादित ढांचे के विध्वंस के बाद 1996 के चुनाव में भी यह प्रमुख मुद्दा बना। हालांकि इसके थबाद इस मुद्दे की आंच लगातार धीमी पड़ती गई। एएसआई की खुदाई, लश्कर ए तयबा के विवादित स्थल पर आतंकी हमले के बावजूद यह कभी मुद्दों के केंद्र में नहीं आ सका। हालांकि सुप्रीम कोर्ट के मध्यस्थता कमेटी के गठन के बाद एक बार फिर से इसके प्रमुख मुद्दों में शुमार होने की संभावना बढ़ी है।