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शनिवार, 9 मार्च 2019

Ayodhya विवाद को हल करने की ये कोशिशें भी हुईं थीं नाकाम, क्या होगा इस मध्यस्थता का परिणाम

Ayodhya विवाद को हल करने की ये कोशिशें भी हुईं थीं नाकाम, क्या होगा इस मध्यस्थता  का परिणाम


राम मंदिर विवाद
राम मंदिर विवाद
सुप्रीम कोर्ट ने अयोध्या विवाद सुलझाने के लिए तीन मध्यस्थों की नियुक्ति कर दी है। अगले दो महीने में ये मध्यस्थ सभी पक्षकारों से बात कर एक समझौते पर पहुंचने की कोशिश करेंगे। लेकिन इस कोशिश के परिणाम को लेकर अभी से सवाल खड़े किए जाने लगे हैं। इसका कारण है कि इसके पहले भी कई बार समझौते की कोशिशें की जा चुकी हैं, लेकिन अब तक इस मुद्दे पर कोई सहमति नहीं बन सकी है।   

दरअसल, बताया जाता है कि पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी अयोध्या मुद्दे को हल करना चाहते थे। उन्होंने मामले के समाधान के लिए अपनी सरकार में गृहमंत्री बूटा सिंह की अगुवाई में एक समिति का गठन भी कर दिया था। कमेटी ने इस मुद्दे से जुड़े सभी पक्षकारों से कई बैठकें कीं और उनसे अपना पक्ष कमेटी के सामने रखने को कहा। विश्व हिंदू परिषद के एक नेता विनोद बंसल के मुताबिक उनके पक्ष ने अयोध्या से संबंधित सभी दस्तावेज कमेटी के सामने रख दिया था। लेकिन मुस्लिम पक्षकारों ने कभी कोई रुचि नहीं दिखाई। यही कारण रहा कि राजीव गांधी की यह ईमानदार कोशिश कभी परवान नहीं चढ़ सकी। 

पूर्व प्रधानमंत्री वीपी सिंह भी अयोध्या विवाद को हमेशा के लिए खत्म करना चाहते थे। उन्होंने भी इस मुद्दे से जुड़े सभी पक्षकारों से बातकर एक रास्ता तैयार करने के लिए कहा था। मुस्लिम पक्षकारों ने अपनी तरफ से बात रखने के लिए प्रमुख विद्वान अली मियां नदवी को नियुक्त किया था। बताया जाता है कि एक बार जब वार्ता हो रही थी, मुस्लिम पक्षकार नमाज पढ़ने के लिए गए। जब वे नमाज पढ़कर वापस आ रहे थे, तब हिंदू पक्षकारों की तरफ से बात की अगुवाई कर रहे स्वामी अवधेशानंद गिरी जी महाराज ने उनके सामने अपनी झोली फैला दी।

अवधेशानंद महाराज ने कहा कि इस्लाम में नमाज के बाद जकात (दान) दिए जाने का प्रावधान है। मैं आपसे पूरे हिंदू समाज की तरफ से अयोध्या की भीख मांगता हूं। लेकिन बताया जाता है कि नदवी इस बात पर भी नहीं पसीजे और वह जवाब दिया जिसके बाद पूरी वार्ता प्रक्रिया ही पटरी से उतर गई। नदवी ने कहा कि अयोध्या कोई माचिस की डिबिया नहीं कि उसे जकात में दे दिया जाए। 

अपने मृदु और खुले व्यवहार के लिए प्रसिद्ध पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर ने भी अयोध्या का हल निकालने की अच्छी कोशिश की थी। अपने छोटे से कार्यकाल में चंद्रशेखर ने इस मामले पर रोजाना सुनवाई कराने की कोशिश की थी। विश्व हिंदू परिषद का आरोप है कि इस बार भी मुस्लिम पक्ष के अपेक्षित सहयोग न मिलने के कारण वार्ता परवान नहीं चढ़ सकी। 

जानकारों के मुताबिक पूर्व प्रधानमंत्री नरसिंहाराव के समय भी अयोध्या मामले का हल निकालने की कोशिश हुई थी। कहा तो यहां तक जाता है कि विश्व हिंदू परिषद के तत्कालीन अध्यक्ष अशोक सिंघल और मुस्लिम पक्षकारों के बीच एक फार्मूले पर सहमति बन गई थी। लेकिन आरोप है कि आरएसएस ने किसी मुद्दे को लेकर इस पर अपनी आपत्ति जाहिर कर दी थी जिसकी वजह से यह मामला हल नहीं हो सका। 

मौजूदा कोशिश से अलग-अलग उम्मीद
विश्व हिंदू परिषद प्रवक्ता विनोद बंसल ने अमर उजाला से कहा कि हम कोर्ट के फैसले का अभी अध्ययन कर रहे हैं। और कुछ समय बाद ही इस पर प्रतिक्रिया दी जाएगी। लेकिन यह अवश्य है कि पूर्व में अनेक ऐसी कोशिशें हुई हैं जिनसे लगता रहा कि दूसरा पक्ष इस मामले को लंबे समय तक के लिए लटकाने की कोशिश कर रहा है। यह मध्यस्थता की कोशिश भी मामले को खींचने की एक चाल हो सकता है। विहिप नेता ने कहा कि एक बात अवश्य तय है कि अयोध्या की एक इंच जमीन भी उन्हें मुस्लिम पक्ष को देना स्वीकार्य नही है।  

वहीं, अयोध्या मामले में एक पक्षकार हिंदू महासभा के अध्यक्ष स्वामी चक्रपाणि ने कहा कि मामले का हल निकालने की हर कोशिश का स्वागत किया जाना चाहिए। मैं तीनों मध्यस्थों को त्रिदेव मानते हुए उनसे देश की भलाई के लिए इस मुद्दे का एक तार्किक समाधान देने की मांग करता हूं। 

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