Pulwama जैसे हमलों और जंग में हताहतों की संख्या में कमी लाने के लिए बनाईं ‘युद्धक दवाएं’

इन हालात को देखते हुए वैज्ञानिकों ने इस दवा को तैयार किया है जिससे घायल जवानों को अस्पताल पहुंचाए जाने से पहले तक के बेहद नाजुक समय को बढ़ाया जा सकेगा। इसे घायल जवानों की जान बचाने के लिहाज से ‘गोल्डन’ समय कहा जाता है।
वैज्ञानिकों ने बताया कि इन दवाओं में जख्म से खून के रिसाव को तत्काल रोकने वाली दवा, अवशोषक ड्रेसिंग और ग्लिसरेटेड सैलाइन शामिल हैं। ये सभी चीजें जंगल, अत्यधिक ऊंचाई वाले क्षेत्रों में युद्ध और आतंकवादी हमलों की स्थिति में जीवन की रक्षा कर सकती हैं।
वैज्ञानिकों ने 14 फरवरी को पुलवामा में हुए आतंकी हमले का जिक्र किया जिसमें सीआरपीएफ के 40 जवान शहीद हो गए थे। उन्होंने कहा कि इन दवाओं से हताहतों की संख्या में कमी लाई जा सकती है।
डीआरडीओ की मेडिकल लैबोरेटरी इंस्टीट्यूट ऑफ न्यूक्लियर मेडिसिन एंड अलाइड साइंसेस में दवाओं को तैयार करने वाले वैज्ञानिकों के अनुसार, घायल होने के बाद और अस्पताल पहुंचाए जाने से पहले यदि घायल को प्रभावी प्राथमिक उपचार दिया जाए तो उसके जिंदा बचने की संभावना बढ़ जाती है।
डीआरडीओ में लाइफ साइंसेस के महानिदेशक एके सिंह ने बताया कि ये स्वदेश निर्मित दवाएं अर्द्धसैनिक बलों और रक्षा कर्मियों के लिए युद्ध के वक्त में वरदान हैं। उन्होंने कहा कि ये दवाएं यह सुनिश्चित करेंगी कि जख्मी जवानों को जंग के मैदान से बेहतर स्वास्थ्य देखभाल के लिए ले जाने के दौरान खून बेकार में न बहे।