मृत्युदंड तभी सुनाएं, जब उम्रकैद की सजा भी लगे कम : Supreme Court

सुनवाई के दौरान तीनों जजों ने ड्राइवर की दोषमुक्त किए जाने की अपील को खारिज कर दिया। लेकिन साथ ही उसे निचली अदालत और फिर हाईकोर्ट से बरकरार रखी गई फांसी की सजा को भी खारिज कर दिया और कहा कि आरोपी के खिलाफ सुबूत मौजूद हैं, लेकिन रिकॉर्ड में सुबूतों की विसंगतियां और प्रक्रियागत खामी भी दर्ज की गई थी। इस टिप्पणी के साथ पीठ ने फांसी की सजा को 25 साल कैद की सजा में तब्दील कर दिया।
पीठ ने यह भी कहा कि आरोपी पर इससे पहले किसी तरह के अपराध का आरोप नहीं होने और उसके पिछले आचरण को ध्यान में रखते हुए हम आश्वस्त नहीं हैं कि उसके सुधरने की गुंजाइश कम थी।
एक ही लकीर पर चलने की परंपरा बदलिए
पीठ ने इस दौरान कहा कि अपराध से जुड़े तथ्यों और परिस्थितियों को ध्यान में रखकर ही सजा तय की जानी चाहिए। आपराधिक मामले के ट्रायल में एक ही लकीर पर चलने की परंपरा को बदलना होगा। ट्रायल तटस्थ नजरिए के साथ तार्किक और यथार्थवादी सोच वाले होने चाहिए।
अपवाद ही रखिए मौत की सजा को
पीठ ने मृत्युदंड को 25 साल कैद में बदलने का ऐलान करते हुए कहा, यह पूरी तरह तय है कि उम्र कैद की सजा वह प्रावधान है, जिसके लिए मौत की सजा अपवाद मामले में ही दी जाती है। मृत्युदंड तभी दिया जाना चाहिए, जब उम्रकैद की सजा अपराध से जुड़े तथ्यों और परिस्थितियों को देखते हुए बेहद कम लगे।