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Wednesday, October 16, 2019

महाराष्ट्र: खामोश मुस्लिमों का दिल जीतने में कसर नहीं छोड़ रहे फडणवीस, पसोपेश में कांग्रेस-एनसीपी

महाराष्ट्र: खामोश मुस्लिमों का दिल जीतने में कसर नहीं छोड़ रहे फडणवीस, पसोपेश में कांग्रेस-एनसीपी

बैठक के दौरान महराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस।
बैठक के दौरान महराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस। - फोटो : bharat rajneeti

खास बातें

  • भाजपा-शिवसेना गठबंधन का सिरदर्द रहे मुस्लिम मतदाता इस बार खामोश
  • इस खामोशी के पीछे छिपी वजह है मुस्लिम समाज की बदलती हुई सोच
  • मुस्लमानों को वोट बैंक मानने वाली पार्टियों को भी बदलनी होगी रणनीति
महाराष्ट्र और मुंबई में हमेशा भाजपा-शिवसेना गठबंधन का सिरदर्द बनते रहे मुस्लिम मतदाता इस बार न सिर्फ खामोश हैं, बल्कि उनके बीच यह जबरदस्त मंथन चल रहा है कि क्या उन्हें वक्त के साथ बदलना नहीं चाहिए। मुसलमानों की इस सोच को मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस के पांच साल की सरकार के कामकाज और खुद फडणवीस के नरम रुख ने भी हवा दी है। दूसरी तरफ कांग्रेस और एनसीपी के नेताओं के रवैये और मुसलमानों के भाजपा-शिवसेना विरोध की मजबूरी को इस वोट बैंक पर अपनी बपौती मान लेने की सोच ने भी उन मुस्लिम नेताओं का काम आसान किया है जिन्हें भाजपा-शिवसेना के प्रति नरम रुख रखने वाला माना जाता है। मुसलमानों की खामोशी और कुछ हिस्सों के बदलते रुख से कांग्रेस-एनसीपी नेता पसोपेश में हैं।

यूं तो भाजपा-शिवसेना गठबंधन के चुनावी प्रचार का मुख्य आधार हिंदुत्व ही है, लेकिन मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने मुसलमानों को भी रिझाने की कोशिशों में कोई कसर नहीं छोड़ी है। इस काम में उनकी मदद कर रहे हैं गुजरात में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की मुस्लिम राजनीति के पुराने सिपहसालार जफर सरेशवाला।

हाल ही में मुंबई के मुस्लिम सामाजिक नेताओं का एक प्रतिनिधिमंडल लेकर सरेशवाला ने फडणवीस से मुलाकात की और उनसे मुस्लिम समाज से जुड़े तमाम तमाम मुद्दों को हल करने का अनुरोध किया। इसमें सबसे प्रमुख है जोगेश्वरी में इस्माइल युसूफ कॉलेज का मुद्दा।

सरेशवाला बताते हैं कि 1910 में एक मुस्लिम कारोबारी इस्माइल युसूफ ने मुसलमानों के लिए उच्च स्तरीय शिक्षण संस्थान बनाने के लिए तत्कालीन ब्रिटिश शासन को छह लाख रुपए का अनुदान दिया था। 1930-32 में मुंबई के जोगेश्वरी में शासन ने इसके लिए 80 एकड़ जमीन खरीदी थी।

लेकिन इसके बाद स्वतंत्रता आंदोलन तेज होने और अंग्रेजों के भारत से चले जाने के बाद यह काम अधूरा रह गया। बाद में राज्य सरकार ने उस जमीन का उपयोग अपने लिए शुरु कर दिया। इसे लेकर मुंबई के मुस्लिम समुदाय के प्रबुद्ध वर्ग में खासा असंतोष है और लोग चाहते हैं कि यहां एक उच्च शिक्षण संस्थान बने।

सरकार ने मुस्लिमों को लेकर दिए थे साफ निर्देश

devendra fadanvis
devendra fadanvis : bharat rajneeti
जफर सरेशवाला बताते हैं कि मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने यह भरोसा दिया है कि अगर राज्य में भाजपा-शिवसेना गठबंधन की सरकार दोबारा बनती है तो राज्य सरकार प्राथमिकता के आधार पर यह मुद्दा हल करेगी।

मुख्यमंत्री फडणवीस ने मुस्लिम समाज के नेताओं से पूछा कि पिछले पांच सालों में उनकी सरकार के दौरान क्या मुसलमानों के साथ कोई ज्यादती या नाइंसाफी हुई। जबकि इसके पहले अक्सर मुस्लिम नौजवानों को मुंबई पुलिस और एटीएस जब चाहे बिना किसी आरोप या सबूत के बुलाकर प्रताड़ित करती थी।

सरेशवाला बताते हैं कि मुस्लिम नेताओं ने इससे सहमति जाहिर की। सरेशवाला ने यह भी कहा कि भले ही देश के अन्य हिस्सों से गौरक्षा के नाम पर मुसलमानों को निशाना बनाने की खबरें आती रहती हैं, लेकिन शुरुआत की कुछ घटनाओं के बाद महाराष्ट्र में इस तरह की हिंसा की खबरें आनी बंद हो गईं।

क्योंकि फडणवीस सरकार ने पुलिस को स्पष्ट निर्देश दे दिए थे कि एसी घटनाओं के लिए सीधी जिम्मेदारी स्थानीय पुलिस प्रशासन की होगी। साथ ही यह निर्देश भी दिए गए कि किसी को भी बिना ठोस सबूत के पुलिस बेवजह परेशान न करे।

क्या ओवैसी को सुनने वाली भीड़ के वोट बंटेंगे?

असदुद्दीन ओवैसी (फाइल फोटो)
असदुद्दीन ओवैसी (फाइल फोटो)
मुस्लिम राजनीति के इन दिनों बेहद आक्रामक चेहरे सांसद असउद्दीन ओवैसी की पार्टी एमआईएम भी चुनाव मैदान में है। मुंबई में उनके एक विधायक वारिस पठान पिछली बार महज डेढ़ हजार वोटों से जीते थे, इस बार कड़े मुकाबले में फंसे हैं। पिछली बार भाजपा शिवसेना अलग अलग लड़े थे जिसका फायदा पठान को मिला था।

लोकसभा चुनावों में जिस तरह ओवैसी की एमआईएम ने दलित नेता और डॉ. भीमराव अंबेडकर के पोते प्रकाश अंबेडकर के साथ गठबंधन करके कांग्रेस-एनसीपी का खेल कई सीटों पर खराब किया था और औरंगाबाद की लोकसभा सीट भी एमआईएम ने जीत ली थी। लेकिन इस बार अंबेडकर और ओवैसी अलग-अलग मैदान में हैं।

इसलिए भी एमआईएम को मुसलमान भी महज वोट काटने वाली पार्टी मान रहे हैं। ओवैसी की तकरीर सुनने लोग तो जुटते हैं, लेकिन वोट कितने मिलेंगे यह कह पाना मुश्किल है। मुस्लिम इलाकों में लोगों से बात कीजिए तो एमआईएम को लेकर वैसा आकर्षण अब नहीं मिलता है जो 2014 के लोकसभा और विधानसभा चुनावों में था और कुछ हद तक 2019 के लोकसभा चुनावों में भी कहीं-कहीं दिखता था।

क्या आप भी रखते हैं ऐसी सोच से इत्तेफाक?

प्रतीकात्मक तस्वीर
प्रतीकात्मक तस्वीर
हालाकि मुंबई कांग्रेस के पूर्व महासचिव आसिफ फारुकी इससे सहमत नहीं हैं कि मुसलमानों में भाजपा-शिवसेना के प्रति लगाव पैदा हो रहा है। फारुकी कहते हैं कि यह सही है कि कांग्रेस एनसीपी गठबंधन अगर और बेहतर तरीके से चुनाव मैदान में उतरता तो मुस्लिम खुलकर समर्थन में पहले की तरह आते। लेकिन इसके बावजूद मुसलमान सेक्युलर ताकतों के ही साथ हैं और रहेंगे।

वहीं प्रापर्टी डीलिंग का कारोबार करने वाले हामिद कहते हैं कि भाजपा शिवसेना को हराने और सेक्युलरिज्म का ठेका अकेले मुसलमानों का ही नहीं है। हमें भी इस मुल्क में रहना है और अमन के साथ अपना कारोबार करना है। इसलिए जो उम्मीदवार और पार्टी हमारी भलाई के लिए काम करेगी हम उसे वोट देंगे, चाहे कोई भी हो।

मुबीन भाई कहते हैं कि पहले कांग्रेस-एनसीपी वाले मुसलमानों को डराते थे कि अगर उन्हें वोट नहीं दिया तो भाजपा-शिवसेना आ जाएगी। लेकिन अब तो पिछले पांच साल से भी ज्यादा वक्त से देश में और राज्य में भाजपा की सरकार ही है तो कौन सी आफत आ गई। इसलिए अब मुसलमानों ने ज्यादा खुले दिमाग से सोचना शुरु कर दिया है।