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Wednesday, January 22, 2020

झारखंड: पत्थलगड़ी का विरोध करने पर उपमुखिया समेत सात लोगों का अपहरण, हत्या की आशंका

झारखंड: पत्थलगड़ी का विरोध करने पर उपमुखिया समेत सात लोगों का अपहरण
झारखंड के पश्चिम सिंहभूमि जिले के गुदड़ी प्रखंड में पत्थलगड़ी का विरोध करने पर सात लोगों का अपहरण कर लिया गया। आशंका जताई जा रही है कि इन लोगों की पिटाई के बाद हत्या कर दी गई है। रविवार को अपहरण होने के बाद से पुलिस इनकी तलाश कर रही है।

पुलिस ने इन लोगों के शवों को जंगल में फेंके जाने की सूचना पर खोज अभियान चलाया है। हालांकि, पुलिस को अभी तक इनमें से किसी के भी शव नहीं मिले हैं। बताया जा रहा है कि अपहरण किए गए लोगों में गुलीकेरा ग्राम पंचायत के बुरुगुलीकेरा गांव के उपमुखिया जेम्स बूढ़ और अन्य छह ग्रामीण शामिल हैं।

पुलिस के अनुसार, पत्थलगड़ी समर्थकों ने रविवार को बुरुगुलीकेरा गांव में ग्रामीणों के साथ बैठक की। इस बैठक का उपमुखिया जेम्स बूढ़ समेत छह लोगों ने विरोध किया। जिसके बाद पत्थलगड़ी समर्थक हमलावर हो गए और इन लोगों को पीटने के बाद जंगल की तरफ लेकर चले गए। बाद में परिजनों की सूचना पर पुलिस ने खोज और बचाव अभियान शुरू किया।

क्या है पत्थलगड़ी और इसकी परंपरा

आदिवासी समुदाय और गांवों में विधि-विधान/संस्कार के साथ पत्थलगड़ी (बड़ा शिलालेख गाड़ने) की परंपरा पुरानी है। इनमें मौजा, सीमाना, ग्रामसभा और अधिकार की जानकारी रहती है। वंशावली, पुरखे तथा मरनी (मृत व्यक्ति) की याद संजोए रखने के लिए भी पत्थलगड़ी की जाती है। कई जगहों पर अंग्रेजों या फिर दुश्मनों के खिलाफ लड़कर शहीद होने वाले वीर सपूतों के सम्मान में भी पत्थलगड़ी की जाती रही है।

दरअसल, पत्थलगड़ी उन पत्थर स्मारकों को कहा जाता है जिसकी शुरुआत इंसानी समाज ने हजारों साल पहले की थी। यह एक पाषाणकालीन परंपरा है जो आदिवासियों में आज भी प्रचलित है। माना जाता है कि मृतकों की याद संजोने, खगोल विज्ञान को समझने, कबीलों के अधिकार क्षेत्रों के सीमांकन को दर्शाने, बसाहटों की सूचना देने, सामूहिक मान्यताओं को सार्वजनिक करने आदि उद्देश्यों की पूर्ति के लिए प्रागैतिहासिक मानव समाज ने पत्थर स्मारकों की रचना की।

पत्थलगड़ी की इस आदिवासी परंपरा को पुरातात्त्विक वैज्ञानिक शब्दावली में ‘महापाषाण’, ‘शिलावर्त’ और मेगालिथ कहा जाता है। दुनिया भर के विभिन्न आदिवासी समाजों में पत्थलगड़ी की यह परंपरा मौजूदा समय में भी बरकरार है। झारखंड के मुंडा आदिवासी समुदाय इसका सबसे बड़ा उदाहरण हैं, जिनमें कई अवसरों पर पत्थलगड़ी करने की प्रागैतिहासिक और पाषाणकालीन परंपरा आज भी प्रचलित है। पत्थलगड़ी कई तरह का होता है। जानकारों का मानना है कि पत्थलगड़ी के कम से कम 40 प्रकार हैं, लेकिन वर्तमान में सात प्रकार के पत्थलगड़ी ही प्रचलित हैं।

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